एथेनॉल उत्पादन के लिए धान, मक्का या गन्ना?
धान, मक्का और गन्ना तीन प्रमुख कृषि फसलें हैं जिनका उपयोग केवल खाद्य उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि जैव-ईंधन और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में भी किया जाता है। एथेनॉल उत्पादन की दृष्टि से धान लगभग 45 लीटर प्रति 100 किलोग्राम के साथ सबसे अधिक उत्पादन क्षमता रखता है। मक्का लगभग 38 लीटर प्रति 100 किलोग्राम एथेनॉल प्रदान करता है, जबकि गन्ने से उसकी चीनी (सुक्रोज़) की मात्रा के आधार पर लगभग 9 लीटर प्रति 100 किलोग्राम एथेनॉल प्राप्त होता है। हालांकि, किसी फसल की उपयोगिता का मूल्यांकन केवल एथेनॉल उत्पादन की मात्रा के आधार पर नहीं किया जा सकता। लागत के संदर्भ में तीनों फसलों के बीच उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। धान की उत्पादन लागत लगभग ₹2,008�2,050 प्रति 100 किलोग्राम तथा मक्का की ₹1,797�1,860 प्रति 100 किलोग्राम होती है। इसके विपरीत, गन्ने की लागत केवल ₹250�320 प्रति 100 किलोग्राम के बीच रहती है। यही कम लागत गन्ने को आर्थिक दृष्टि से अधिक आकर्षक बनाती है और इसकी अपेक्षाकृत कम एथेनॉल उपज की भरपाई कर देती है। इन फसलों से प्राप्त उप-उत्पाद भी उनकी आर्थिक और औद्योगिक उपयोगिता को प्रभावित करते हैं। धान के अवशेषों का उपयोग बायो-ऑयल, बायोचार, सक्रिय कार्बन, सिलिका निष्कर्षण, ग्रीन कंक्रीट, पशु चारा तथा मशरूम उत्पादन में किया जा सकता है। दूसरी ओर, मक्का से बायोएथेनॉल, बायोगैस, पशु आहार और जैविक खाद तैयार की जाती है। गन्ने से प्राप्त बगास का उपयोग बिजली उत्पादन, कागज़ एवं पल्प उद्योग, जैविक उर्वरक, जल शोधन और अतिरिक्त बायोएथेनॉल निर्माण में किया जाता है, जिससे इसकी औद्योगिक उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है। जल उपयोग दक्षता के मामले में भी तीनों फसलों में स्पष्ट अंतर है। धान की खेती के लिए लगभग 2.5 से 5 लाख लीटर पानी प्रति 100 किलोग्राम उत्पादन की आवश्यकता होती है, जबकि मक्का के लिए यह मात्रा लगभग 90 हजार से 1.5 लाख लीटर तक रहती है। इसके मुकाबले गन्ने के लिए अनुमानतः 15 हजार से 25 हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिससे यह अपेक्षाकृत अधिक जल-कुशल विकल्प माना जा सकता है। यदि एथेनॉल उत्पादन, उत्पादन लागत, जल उपयोग दक्षता और उप-उत्पादों की उपयोगिता जैसे सभी पहलुओं को एक साथ देखा जाए, तो गन्ना समग्र रूप से सबसे अधिक लाभदायक और व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभरता है। धान जहाँ उच्चतम एथेनॉल उत्पादन प्रदान करता है और मक्का एक संतुलित विकल्प प्रस्तुत करता है, वहीं गन्ने की कम लागत, बहुआयामी औद्योगिक उपयोगिता और बेहतर संसाधन दक्षता इसे दीर्घकालिक एवं टिकाऊ जैव-ईंधन उत्पादन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त बनाती है। फिर भी, केवल उत्पादन क्षमता, लागत या लाभप्रदता के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि सरकार एथेनॉल उत्पादन के लिए किस फसल को प्राथमिकता देगी। सरकारी नीतियाँ खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय, क्षेत्रीय कृषि परिस्थितियाँ, जल संसाधनों की उपलब्धता, ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक संरचना और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे अनेक व्यापक कारकों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। इसलिए एथेनॉल कार्यक्रमों में किसी फसल की प्राथमिकता केवल तकनीकी या आर्थिक गणनाओं पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों और नीतिगत उद्देश्यों पर भी निर्भर करती है।