मजबूत आवक, स्थिर मांग और सीमित सप्लाई के बीच गेहूं बाजार में उतार-चढ़ाव
पिछले सप्ताह गेहूं का बाजार काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। सप्ताह की शुरुआत में कीमतों में तेज उछाल देखा गया, जबकि अंत तक बाजार में कुछ नरमी आ गई। आज भी कारोबार हल्की मजबूती के साथ शुरू हुआ है। पहले से ही संकेत दिए जा रहे थे कि बाजार धीरे-धीरे ऊपर की दिशा में बढ़ सकता है। बीते सप्ताह मंडियों में आवक अच्छी रही। सरकारी एजेंसियों के साथ फ्लोर मिलर्स ने भी सक्रिय रूप से खरीदारी की, लेकिन किसानों और स्टॉकिस्टों ने अभी भी माल रोक कर रखा हुआ है। दिल्ली में कीमतें सप्ताह के दौरान ₹2700 प्रति क्विंटल तक पहुंचीं, हालांकि उतार-चढ़ाव के बाद शनिवार को ₹2655 पर बंद हुईं और आज फिर ₹2675 पर खुली हैं। पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले भाव लगभग समान हैं। अन्य प्रमुख बाजारों में नजफगढ़ ₹2500, इटारसी ₹100 की तेजी के साथ ₹2600, बेंगलुरु ₹2800, जबलपुर ₹2535, नागपुर ₹2450, कोलकाता ₹2725 और हैदराबाद ₹2770 प्रति क्विंटल दर्ज किए गए। वहीं शाहजहांपुर और मैनपुरी में ₹10-30 की हल्की गिरावट देखने को मिली। बाजार की चाल में मुख्य भूमिका न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹2585 और मंडी भाव के बीच के अंतर ने निभाई। जब यह अंतर अधिक रहा, तब तेजी बनी रही, लेकिन जैसे ही कीमतें MSP के करीब आईं, बाजार की रफ्तार धीमी पड़ गई। दक्षिण और पश्चिम भारत के खरीदार लगातार खरीदारी कर रहे हैं क्योंकि उन्हें अपनी आपूर्ति श्रृंखला के लिए स्टॉक भरना है, जिससे फिलहाल बड़ी गिरावट की संभावना कम दिखाई देती है। दूसरी ओर, जिन स्टॉकिस्टों ने निचले स्तर पर खरीद की थी, वे अब मुनाफावसूली कर रहे हैं। सरकारी खरीद इस सीजन की शुरुआत में अपेक्षाकृत धीमी रही। 20 अप्रैल तक देशभर में 157.88 लाख टन आवक के मुकाबले 114.29 लाख टन की ही खरीद हो पाई, जो पिछले वर्ष से कम है। हालांकि, गुणवत्ता मानकों में ढील देने के बाद खरीद में कुछ तेजी आई है। इस बार गुणवत्ता एक प्रमुख चिंता रही, जिसके चलते सरकार ने कई राज्यों में नियमों में नरमी बरती है। अब 50% तक बदरंग और 15% तक टूटे दानों वाले गेहूं की भी खरीद की जा रही है। निर्यात के मोर्चे पर सरकार ने कोटा बढ़ाकर 50 लाख टन कर दिया है, लेकिन फिलहाल वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा कमजोर बनी हुई है। भारतीय गेहूं की कीमत $265-270 प्रति टन है, जबकि रूस और यूक्रेन $230-240 प्रति टन पर सस्ता गेहूं उपलब्ध करा रहे हैं। ऐसे में भारत प्रमुख निर्यातक के रूप में आगे नहीं आ पा रहा, हालांकि नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में सीमित निर्यात संभव है। उत्पादन को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। एक सर्वे में 1106.5 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया गया है, लेकिन व्यापार जगत का मानना है कि वास्तविक उत्पादन इससे कम हो सकता है। सरकार ने खरीद लक्ष्य बढ़ाकर 345 लाख टन कर दिया है। यदि इसमें 220 लाख टन का पुराना स्टॉक जोड़ दिया जाए, तो कुल उपलब्धता 565 लाख टन तक पहुंच सकती है। इसके आधार पर सीजन के अंत में 300-350 लाख टन का क्लोजिंग स्टॉक रहने का अनुमान है। कुल मिलाकर, वर्तमान में बाजार न तो बहुत तेज है और न ही ज्यादा कमजोर। अल्पावधि में कीमतें सीमित दायरे में रह सकती हैं, लेकिन दीर्घकालिक रुझान मजबूत बना हुआ है। पिछले साल ₹2885 प्रति क्विंटल का उच्च स्तर देखा गया था, और इस बार इसके पार जाने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि आपूर्ति, गुणवत्ता और सरकारी खरीद जैसे कारक कीमतों को नीचे टिकने नहीं दे रहे।